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Sunday, September 24, 2017

'न्यूटन' से...'द न्यूटन' तक!


 The ignorance of one voter in a democracy impairs the security of all. लोकतंत्र में एक मतदाता की अज्ञानता सभी की सुरक्षा को कम करती है। - जॉन एफ केनेडी
  
   न्यूटन फ़िल्म देखते हुए कई बार पूर्व अमरिकी राष्ट्रपति केनेडी की ये बातें जेहन में कौंध रही थी। तब और जब सिर्फ़ चार वोटों के लिये चुनावी ड्यूटी पर तैनात न्यूटन, सुरक्षा अधिकारी पर सीधे बंदूक तान देता है कि अभी चुनाव खत्म होने में समय है। ये वोट तो किसी भी हालत में डलने ही हैं। एक ओर वोट पड़ रहे थे और दूसरी ओर सुरक्षा में लगा अफ़सर अचानक हुए इस बदलाव से भौंचक्का रह जाता है। बीच जंगल इस तरह के वाकये को पेश करने में डायरेक्टर ने गजब की कुशलता दिखाई है। वोटिंग के दौरान दोपहर के भोजन के बाद से तीन बजने तक एक के बाद एक सिक्वेंस जिस तरीके से गढ़े गये उनकी जितनी तारीफ़ की जाय कम है।
   
   बीच-बीच में जिस तरह के छोटे-छोटे डॉयलॉग आम ज़ुबान में बोले जाते हैं वे अलग ही माहौल बनाते रहे। रावण पहला पायलट था....ये जो समतल जमीन दिख रही है...यहीं से पुष्पक उड़ा था....इस तरह के कई अंश हैं जिन्हें देखते हुए दर्शक हंसते भी हैं और उस पर सोचने के लिये मज़बूर भी होते हैं। बस में बैठे न्यूटन पर जब उसका पिता दहेज लेने के लिये अपनी अलग ही रौ में दबाव डालता है तो अलग ही माहौल रच उठता है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है मुझसे पीछे बैठा शख़्स अपने साथी से बोल पड़ा – अभिषेक देख, ....डिट्टो तेरा बाप का माफिक

   फ़िल्म की शुरूवात में जिस तरह चुनावी ड्यूटी पर लगे सरकारी कर्मचारियों को समझाया जाता है, अनमने ही किसी तरह ड्यूटी पूरी कर लौटने की ललक रहती है वह भी बखूबी बयां किया गया है। दुर्गम इलाके में ड्यूटी लगने पर एक सरकारी कर्मचारी तो सीधे सपाट लहजे में कह भी देता है कि वह तो सिर्फ़ हेलिकॉप्टर में बैठना चाहता था। यानि लोकतंत्र के नाम पर चुनाव वगैरह तो सिर्फ़ बहाना है। इसके मायने दरअसल सबके लिये अलग-अलग हैं। किसी के लिये हर वोट का महत्व बताना, लोकतंत्र को मज़बूत करना, जागरूकता, युवा भारत सब कुछ किसी चुनावी छलावे सा लगता है तो किसी के लिये ये चीजें इसलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उसे इस काम के लिये तैनात किया गया है और उसे अपना काम ठीक से करने में एक किस्म की संतुष्टि सी मिलती है। इसमें कोताही होने पर होने वाली बेचैनी, असमंजस से कोई किस कदर परेशान हो सकता है इसकी बानगी भी फ़िल्म में देखी जा सकती है।    
  
  फ़िल्म में एक सीन है जिसमें सुरक्षा अधिकारी, न्यूटन को जमीन पर गिरा कर अपनी ताकत के जोर से दबाये रखता है। उस दौरान दोनों के बीच हाथापाई होती है लेकिन शरीर से कमज़ोर न्यूटन का बस नहीं चलता। इस हाथापाई के अंत में जिस अंदाज में सुरक्षा अधिकारी गिरे हुए न्यूटन की बांह पर थपकी मारता है वह अपने आप में इशारा करने के लिये काफी है कि जब शक्ति के मद में चूर सिस्टम जब अपने से कमज़ोर पर काबू पा लेता है तो अंत में एक थपकी मार कर जता भी देता है कि देख मैंने तेरी क्या हालत कर दी।

  जहां तक कास्टिंग का सवाल है तो यूं लगता है मानों यह फ़िल्म राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी के अलावा कोई कर भी नहीं सकता था। यदि करता तो शायद उतनी न जमती। गोंड आदिवासियों के हाव-भाव,  बाहरी लोगों को देख एक किस्म का अविश्वास भाव, बात करने का लहजा सारा कुछ वास्तविक। एक जगह सरेंडर कर चुका आदिवासी नक्सली कुछ हिन्दी में पढ़ रहा होता है तो दूसरा उसके मुंह की ओर जिस अंदाज में देखता है वह काफ़ी सामान्य सा लगता है लेकिन बगल में ही चाकू से कुछ काम कर रहा शख्स एक बार पलट कर उस नक्सली की ओर देखता है जो हिन्दी में कुछ पढ़ रहा होता है। इस पूरे सीन को एक ही शॉट में फ़िल्माया गया है और दर्शक काफ़ी ध्यान से सुनना चाहते थे कि आखिर यह क्या पढ़ रहा है ठीक उस चाकू से काम कर रहे शख्स की तरह। एक तरह से फ़िल्म का यह सीन दर्शकों को बांध सा लेता है।  

     लोकेशन, छायांकन सब कुछ बढ़िया लगा। कमी लगी तो फ़िल्म का अचानक खत्म हो जाना। 
थोड़ी स्मूथ एंडिंग की जा सकती थी। रि-इलेक्शन की लिस्ट में उस गाँव को भी दिखाया जा सकता था या फिर विदेशी जर्नलिस्ट द्वारा होटल में मुर्गे की टांग चिचोरते डिस्कशन रैप-अप किया जा सकता था। इस मामले में पीपली लाइव का उदाहरण लिया जा सकता है जिसमें नत्था शहर में मज़दूरी करता हुआ दिख रहा था और साथ ही कैमरा जूम आउट हो रहा था।

- सतीश पंचम

     

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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