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Sunday, May 20, 2012

सरोखन धोतीवाले......बमचक-5


बमचक-5

परधान जब कोईराना में दाखिल हुए तो अपने दरवाजे पर बैठकर बीड़ी पीती जैतू की बूढ़िया मां मुनरा नजर आई।

“कैसी हो मुनरा” ?

“ठीक हई परधान” – कहने के साथ ही सिर पर पल्लू रखते हुए, बीड़ी वाला हाथ मुनरा ने बोरे की आड़ में कर लिया। मुनरा आज भी परधान का आदर करती है और वही आदर भाव मुनरा के बेटे जैतू और उसके परिवार के लोग परधान के प्रति रखते हैं। इस आदरभाव के मूल में ग्राम पंचायत की वह जमीन थी जिसे जैतू के बाप के मरने के बाद परधान ने दौड़ भाग करके मुनरा के परिवार के लिये जीवनयापन आदि के लिये ग्रामसभा की कुछ जमीन पट्टे पर दिलवाया था। यह वह दौर था जब गाँव में दुखियारे की सहायता के लिये विरोधी-समर्थक जैसा भेद नहीं होता था। लोग आपद धर्म निभाने से पीछे न हटते थे।

     जब विवाह के बाद एक बच्चा जन्मते ही मुनरा के पति रजिन्नर के बारे में खबर आई कि कलकत्ते में जूट मिल की मशीन में फंसने से उसकी मृत्यु हो गई है तो गाँव ने मुनरा को थाम लिया. जिससे जैसा बना उसने अपने से सहायता की, उसके एक बिगहे खेत के लिये जरूरी बेहन, खाद, पानी का इंतजाम किया गया। लोग जब अपना खेत जोतते तो एक फेरा मुनरा के खेत में भी देख आते कि कहीं उसके खेत भी जोतने लायक न हो गये हों।

“बड़की बिट्टी कब आय रही है परधान” ? – मुनरा ने बैठे बैठे ही पूछ लिया

“अबकी देखो भादौं लगते ही लाने का विचार है” – चलते चलते ही जवाब दिया परधान ने और आगे बढ़ गये।

“जियत रहांय, जहां रहांय” – मुनरा ने हाथ उठाकर असीस दिया।

तभी परधान की नजर रामधन कोईरी के घर के पिछवाड़े पड़ी जहां पर कि अक्सर गंदगी रहती थी, महिलायें या पुरूष जब मन आता अपनी लघुशंका का निवारण वहीं करते थे। आज वहां एक छोटी क्यारी थी जिसमें भिण्डी उगाई गई थी।

“ये तो बड़ा अच्छा किया रामधन ने। घर के पिछवाड़े भिण्डी लगा दी”

“कोईराना में अब जमीन कहां बची परधान सब्जी ओब्जी उगाने के लिये. हर किसी के परिवार बढ़ रहे हैं तो जमीन घट रही है। अब जिसके जैसा दांव बैठ रहा है जमीन खन के बोय रहा है. यही न कमाई का रास्ता है कोईराने में” – सरोखन ने बताया।

    अभी उन दोनों की बातचीत चल ही रही थी कि सरोखन का घर आ गया। सरोखन की बुढ़िया लम्मो घर के बाहर ही बोरा बिछाकर बैठी थी. बाहर और कोई दिख नहीं रहा था। परधान को देखते ही लम्मों एकदम से उठ बैठीं.

“हाथ जोड़त हई परधान, ई कलकान से हमैं छुट्टी देलाय द” - लम्मों ने हाथजोड़कर परधान से कहा.

“अरे तो पहले बैठने दोगी कि आते साथ पंवारा पढ़ाओगी” – सरोखन ने आगे एक झोलंगही खटिया की ओर बढ़ते हुए कहा. आम के पेड़ के नीचे खटिया बिछा दी गई. निखड़ाहरे खटिया देख सरोखन अंदर से दरी लाने जा ही रहे थे कि परधान ने मना कर दिया कि ऐसे ही ठीक हैं.

    तभी अंदर से बहू ने लोटे में पानी के साथ मौनी में गुड़ रखकर भेजा गया। परधान ने लेने से मना कर दिया. वैसे भी दोनों परानी के भूखे रहते इस तरह गुड़-पानी लेना ठीक न था. बहुत आग्रह पर केवल पानी पीकर गमछे से मुंह पोंछ भर लिये.

   “त का कहात हय परधान, हम दूनूं जने क जिनगी क फैसला कराय के तबै जाईं” – लम्मों ने तर्जनी उंगली निकालकर हवा में लहराते कहा.

   “अरे पागल भई हो, हर घर में चूल्हा माटीये का है, टिनिर पिनिर तो चलता ही रहता है तो का करोगी जिऊ दोगी” ?

 “हर घर में चलत होई परधान लेकिन एस घरे के जइसे नांय जहां सासु के पीढ़ा फेंक के मारा जाय”

“ईतो गलत है लम्मों , इस तरह से नहीं होना चाहिये था लेकिन कुछ तुम्हारी भी तो बेजांह होगी...अइसे कइसे कोई पीढ़ा फेंक कर मारेगा” ?

“हम हेंही बइठी रहे परधान हेंही....देख रहे हो न ....हेहीं जइसे आज बइठी रहे ओइस्से एकदम बइठी रहे....तबले ई बड़की छिनरीया ने इहे पीढ़ा फेंक के मारा है....देख लो अब तक वइसे ही उलटा पड़ा है” – लम्मों ने उल्टे पढ़े पीढ़े की ओर इशारा किया.

“अरे तो कुछ बात होगी कि अइसे ही...”

“हम खाली एतना कहे रहे परधान कि अपने बाप के इहां जइसे रहती है वइसे मत रह तनिक मूड़े पर ठीक से साड़ी ले लिया कर....बड़ा बुजुर्ग लोग हैं....तनिक मान रख...तो बताओ इसमें क्या गलत किया मैंने”

“गलत तो नहीं कहा...लेकिन इतने भर से कोई क्यों मारेगा...”

“और वो नहीं बताओगी कितना गरियायी थीं.....बाप को हमरे गारी दी, भाई को गारी दी....हमारा बाल पकड़कर मारी उसे नहीं बताओगी” – पहली बार अंदर से सरोखन की बड़की पतोहू की आवाज आई थी

परधान ने नजरें जमीन पर गड़ाये हुए ही कहा – “त उहै तो कह रहा हूं कि बताओ क्या हुआ त आधे आध पर बता रहे हो....वो आपन बता रही हैं...तूम आपन बता रही हो”

“हमने 'पापा' को भी कह दिया था कि देखो 'मम्मी' हमरे ससुराल को गंदी बात बोलती हैं लेकिन पापा उनको बोलने की बजाय हमीं को बोलने लगे” – किवाड़ की ओट से बहू की आवाज आई.

    परधान को झटका सा लगा. इस धोती वाले सरोखन को बहू ‘पापा’ कहती है ये लम्मों जिसको बालों से ढील हेरने का ही गुन है मदाहिन-मदाहिन गन्हाती रहती है उसे बहू ‘मम्मी’ कहती है....वाह रे सरोखन....इसे ही भाग्य कहते हैं....वरना कहां हरजोतवा-सरजोतवा को कोई ‘मम्मी’ औ ‘पापा’ कहेगा..... जरूर पतोहीया पढ़ी लिखी होगी, आखिर ओकील की बेटी है.

    संभलते हुए परधान ने कहा – “लम्मों, पहली बात त ई कि पहली गलती तुम्हारी थी जो पतोहू को गरियायी....जब एक बार रिसता जुड़ गया तो उहो परिवार आपन है....इसमें बहू के परिवार को गरियाना कहां की बुद्धिमानी है” ?

“बात बुद्धिमानी वाली नहीं परधान सरीकत क बात है” - अबकी सरोखन से बोले बिना रहा न गया.

“कइसन सरीकत” ?

“इहे कि जब हम कहीं से हाट बजार से आ रहे हैं, कुछ सौदा खरीद ओरीद के ला रहे हैं तो क्या इसका फर्ज नहीं है कि उसे हटाकर चउके में रखे, घर में ले जाय. कल बाजार से आध पाव जलेबी ले आया था कि घर में लड़के बच्चे हैं तनिक खा लेंगे। लाकर वहीं ओसारे में रख दिया लेकिन मजाल है जो पतोहिया ने उसे वहां से हटाया हो” .

“तब” ?

“तब क्या, मैं वहां लोटा लेकर दिसा मैदान चला गया, ये लम्मों उधर बसंतू की बीमार महतारी को देखने तनिक उनके दरवाजे चलीं गई इधर कुकुर आकर जलेबी जूठार गया”.

“तब” ?

“औ पतोहू देखकर भी नहीं बताई कि कुकुर ने जलेबी जुठारा है....”

“हम नहीं देखे थे पापा...सच कह रहे हैं....हम खाली यही देखे कि कुकुर ने वहां कुछ सूंघा था और थोड़ा सा थोड़ी देर बाद चला गया था.....अन्हियारे ढिबरी के उजाले में ठीक से दिख भी नहीं रहा था...इधर छोटकी का पेट झर रहा था उसे ही पैरों पर बैठा टट्टी करा रही थी.....कइसे हम सब देखतीं” ?

“त दूरबीन लिया दूं....रांड़ आन्हर हो गई थी...दिख नहीं रहा था” – लम्मों ने प्रतिवाद किया.

“ए लम्मों तनिक ‘अइती’ में रहो....जब वह कह रही है कि उसे ठीक से नहीं दिखा तो क्यों बात बढ़ा रही हो” – परधान ने बीचबचाव किया.

“अरे एस आन्हर होय गई थी ये.....बता देते ओकील की बिटीया आन्हर है तो नहीं लाती पतोह बनाकर...अच्छे अच्छे दरवज्जा खांच रहे थे मेरे लइका के लिये”

“हां, बहुत सहुरगर हैं न आपके बेटाजी” ?

“देख्...देख् परधान..अब हमरे बेटवा पर आच्छन लगा रही है पतोहिया”

“अरे कुछ भी है, तनिक समझ-बूझ के रहो, काहे एतना छोटी-छोटी बात पर कलकान किये हो”

“छोटी बात नहीं है परधान, अभी आप ही देखे कइसे हमरे बेटवा पर बोली बोल रही है ई ‘भतारकाटी’ .....इसका यही सहूर देखकर तो वह पूछता ही नहीं” – लम्मों ने दांत पीसकर कहा.

“फिर फालतू बोल रही हो...जब कह रहा हूं कि समझ-बूझ के रहो तो क्यों बात बढ़ा रही हो. जाओ चुपचाप नहाओ-खाओ, इस तरह परिवार में बात-बेबात झगरा बढ़ाना नहीं चाहिये” - परधान ने अपनी ठुड्डी खुजलाते हुए कहा.

“हम कहां बढ़ाना चाहते हैं परधान, इसीलिये तो आपको बुलवाये कि तनिक आपौ देख लो कि किसकी अगुअई किये थे”- सरोखन ने परधान जी को याद दिलाया.

“फिर वही बात ? अगुअई किया था तो गलत तो नहीं किया था. पढ़ी लिखी पतोह पाये हो.....तुम्हें पापा और लम्मों को मम्मी कह रही है क्या कम है” ?

अबकी सरोखन ने सिर नीचे कर जमीन निहारना शुरू किया. बात तो परधान सच कह रहे हैं. और कोई पतोह पूरे गांव में अपने सास ससुर को मम्मी पापा नहीं कहती. और लोगों से एक दर्जा उंचा ही है सरोखन का कद. लेकिन इस बूढ़िया लम्मों को यह बात कौन समझाये ?

“बात मानता हूं परधान.....बाकिर वही बात कि तनिक पतोहीया काम-ओम में धियान देती तो अच्छा रहता...खाली मम्मीयै-पापा कहे से थोड़ो न पेट भरता है” ?

“अरे तो धीरे-धीरे सीख जायेगी...करेगी सब काम जइसे और लोग करते हैं....चलत बरधा को पइना नहीं मारा जाता ये जान लो .....यही लम्मों हैं....जब आईं थी तो केतना अपने सास से झगरा करती थीं हम लोग नहीं जानते क्या....कि आज ही आये हैं इस गांव में”

“हमार बात छोड़ा परधान...हम जइसे तब रहे ओइसे अबइहों हैं....बात बताईं साफ....लेकिन मजाल है काम में कौनो कमी होय”.

“काम में कइसे कमी दिखती जब सास जियती तो कमी दिखती. वो तो आठै दस साल में सादी के बाद चल गईं... अब काम में कमी निकाले तो कौन निकाले” ?

    सरोखन को अब परधान का यूं लम्मों पर आक्षेप लगाना खटकने लगा. बुलाकर लाये थे फरियाने उल्टे परधान पाला बदलकर बहू की ओर से बोल रहे हैं....सिर्फ ‘मम्मी’ और ‘पापा’ बोलने के चलते. सरोखन ने अब मानना शुरू कर दिया कि अंगरेजी बोल-चाल और कुछ करे न करे सुनने वाले पर असर जरूर करती है यहां तक कि लोगों की मति भी बड़ी जल्दी फेरती है, वैसे ही जइसे परधान की मति फेरी है.

   उधर परधान इन सब कलकान से अलग कुछ सोच रहे थे कि एक उनकी पतोह है जो समय पर कपड़े लत्ते और खान-पान का इंतजाम कर दे वही बहुत है. इस सरोखना का भाग्य जबर है....इस जन्म में ही ‘पापा’ कहला रहा है.....और ई ढीलहेरनी लम्मों जिसको केत्थौ का सहुर नहीं, ‘मम्मी’ बनी है......वाह रे भाग्य.....अब तो शायद अगले जनम में ही ई साध पूरी होगी.....इस जनम में तो होने से रही.

(जारी....)


- सतीश पंचम

8 comments:

GYANDUTT PANDEY said...

अपने गांव की याद हो आयी!
बहुत बढ़िया लिखा है!

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

मुखिया की पंचायती का आनंद आ रहा है, कहानी भी मेरे गाँव जैसी ही है।

अनूप शुक्ल said...

कहानी सबके गांव जैसी है। :)

प्रवीण पाण्डेय said...

मम्मी से अधिक सुख अम्मा में है, जब जानेंगे तब जिद छोड़ देंगे..

आशीष श्रीवास्तव said...

हम पढ़ रहे है जी!

Shiv Kumar said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने ...

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कहानी तो जो है सो है सबके गांव जैसी मगर लिखा गज़ब है भाई। गांव गिरांव के लुप्त हो रहे शब्दों का जिस खूबसूरती से आपने प्रयोग किया वह लाज़वाब है।
सुबह पढ़कर दफ्तर गया था और आते ही आपका ब्लॉग खोलकर पढ़ने बैठ गया। अवसर मिला तो इसे पढ़ाउंगा मित्रों को भी जो नेट पर नहीं बैठते।

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