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Thursday, June 28, 2012

सफ़ेद घर....कुछ बातें....कुछ यादें

        ल्यौ जी... सफ़ेद घर ने भी 400 पोस्टों का आंकड़ा छू लिया। डैशबोर्ड पर दिख रही तारीख के हिसाब से पिछले महीने ही मेरी ब्लॉगिंग के चार साल भी पूरे हो गये। यानि करीब करीब सौ पोस्ट प्रति वर्ष। आनंदम् आनंदम्। वैसे अंदर ही अंदर पता तो चल ही रहा था कि चार साल से लिख रहा हूँ.....ठीकठाक ही लेखन है ..न बहुत अच्छा है न बहुत खराब.. मौज-ए-सुकून चल रहा है लेकिन होते-होते चार सौ पोस्टें हो जाना मेरे लिये एक सुखद अनूभूति ही है क्योंकि कभी मैं सोचा करता था डेढ़-दो सौ पोस्टें लिख लूं बस्...आगे और टाईम वेस्ट नहीं......लेकिन पेन के विज्ञापन की तरह.... "लिखते लिखते लव हो जाय" की तर्ज पर अपन भी ब्लॉगिंग के साथ लिखते लिखते "लव यू टू" हो लिये। समयानुसार फेसबुक ट्वीटर पर भी घूमे लेकिन वो  किसी शायर ने कहा है न -


हम दिल्ली भी घूमे, लाहौर भी हो आये
ऐ यार मगर   तेरी  गली  तेरी  गली   है

     तो कुछ वैसी ही अनुभूति होती है मुझे ब्लॉग में। चाहे घूमते फिरते कितने भी सोशल नेटवर्किंग्स पर जुड़ूं, लेकिन असल आनंद अपने सफ़ेद घर पर ही मिलता है। चाहे यहां बमचक लिखूं या बतकूचन....हर एक का लुत्फ अलग ही महसूस होता है। अभी चार सौ पोस्टों के पूरी होने के उपलक्ष्य में जब अपनी पुरानी पोस्टों पर नज़र डाल रहा था तो कुछ को पढ़ते हुए बहुत हंसी आ रही थी कि - मन में बात आ रही थी कि क्या मैं ही हूँ जिसने इतना फालतू लेख लिखा था ( हो सकता है कुछ वर्षों बाद यही बात मैं आजकल की अपनी पोस्टों के बारे में कहूँ....कुछ पोस्टों के बारे में तो अभी से पता है कि खराब लिखा है :-)

     इस बीच ढेर सारे वाकये याद आ रहे हैं - एक वो पलक वाला मामला याद आ रहा है, अरे वही जिसमें एक पुरूष फर्जी प्रोफाइल के जरिये महिला बनकर कामुक इशारों से कवितायें लिखती थी और हजरात लोग थे कि वाह वाह कर आते थे। खूब वाह वाही किये...क्या बात ...क्या बात। जबकि मुझे शुरू से महिलाओं की लिखी कविताओं से अरूचि रही है। ऐसा नहीं कि मुझे कवितायें पसंद नहीं लेकिन नेट पर जो कवितायें हैं उनको देख देखकर अच्छा खासा मूड़ खराब हो जाता है। न सिर न पैर लेकिन टिप्पणीं देखो तो खांची भर भर। तिस पर पलक वाली कविताओं पर तो जैसे बाढ़ आई थी। मामला समझते ही मैंने मौज लेते हुए 'ओढ़निया ब्लॉगिंग' वाली मैंग्रोव पोस्ट लिखी.....और अचानक ही जैसे सारा बहाव उस मैंग्रोव पोस्ट की वजह से थम सा गया ......लोगों को अचानक से एहसास हुआ कि ठगे गये, किसी पुरूष ने महिला का रूप धरकर छका दिया। हद तो तब हो गई जब कुछ ऐसे लोग जो कभी यहां वहां टिप्पणी नहीं करते थे वे भी पलक की पलकों पर आबाद दिखे। वे लोग भी खदबदाये कि यार ऐसे कैसे भ्रमित हुए। बाद में तो न पलक रही न उसे ढोने वाली पालकीबाज...सबकुछ अंतर्ध्यान। उसका अंश है....

"कभी आपने गाँव में हो रहे नाच या नौटंकी देखा हो तो पाएंगे कि नचनीया नाचते नाचते अचानक ही किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।
 
     और जो ओढ़नी के भीतर ओढ़ा दिया होगा वह अंदर ही अंदर नचनीया पर मुस्की मार रहा होगा और मुस्की मारते हुए जेब से पांच दस रूपए अपना नाम बताते हुए दे देगा। एकाध बार ओडनी के भीतर ही भीतर गाल-ओल भी सहला देगा। नचनीया फिर नाचते नाचते अपने स्टेज पर पहुंचेगी, हारमोनियम मास्टर तान पर तान छेडे रहेगा और इसी बीच वह घोषणा करेगी कि – ढेलूराम टेलर, केराकत चौराहा वाले की ओर से दस रूपईया इनाम और एही के लिए मैं अगला गीत उन्हें समर्पित करती हूँ कि – गर्मी के महीना, बाली उमरिया...... टप्प टप्प चुए पसीना बलम तनि पंखा चलाय द हो.......इतना कहना होगा कि भीड़ एकदम लहालोट.....सीटी बजने लगेगी, पानी का पिचकारी भीड पर फौवारा कर रहा होगा और जिसका नाम स्टेज पर से घोषित होगा और जिसके नाम पर गीत समर्पित होगा वह ढेलूराम टेलर अंदर ही अंदर मगन होगा कि चलो इसी बहाने मेरी दुकान का प्रचार हो रहा है"।

      दूसरी वो पोस्ट याद आती है - पलटदास वाली। इसमें भी कुछ वही प्रवृत्ति थी। भाई लोग जा-जाकर प्यार, भाईचारे और शांति से रहने वाला संदेश टिकाते और वहीं महिलाओं के ब्लॉगों पर मंडराते रहते। नतीजतन मौज लेती वह पलटदास वाली पोस्ट लिखी। कई ब्लॉगर उखड़े-पखड़े, किसी ने मौज ली तो किसी ने कुढ़ना ठीक समझा। लेकिन कुछ भी हो, मजा आया था उस पोस्ट को लिखकर। अंश देखिये...

      "जब देखो तब कोई न कोई आकर ब्लॉगजगत में नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगता है। यह नैतिक है, वह अनैतिक है। महिलाओं पर ऐसा मत लिखो, पुरूषों पर वैसा मत लिखो, फलां लिखो, टलां लिखो। इतनी ज्यादा प्रेंम-सद्भाव, नैतिकता, समानता, विश्व बंधुत्व, भाईचारा ठेलने लगते हैं, कि लगता है जैसे किसी देवता के अवतारी पुरूष हैं। और नारीवादीता तो जैसे इनके हाथों में विष्णु भगवान की तरह सजने वाला फूल ही समझिये। जहां कहीं इन्हें लगता है कि कोई सुन नहीं रहा, तुरंत नैतिकता का शंख फूंकना शुरू कर देंगे। इधर उन्होंने शंख फूंका नहीं कि उसकी आवाज सुनकर तमाम उपलब्ध गण शंख ध्वनि के बाद एक साथ जय बोल देंगे"।

     वैसे एक बात नोटिस की है अपने लेखनी में कि मैंने फिल्म, साहित्य या रोजनामचों को लेकर ही अधिकतर पोस्टें लिखा है, न कि ब्लॉग, ब्लॉगिंग या ब्लॉगत्व आधारित मजमेबाज पोस्टें। इसे मैं अपने लिये एक किस्म की उपलब्धि ही कहूँगा वरना तो ब्लॉगिंग का 'इंटेलेक्चुअल भिखमंगापन' भी देखा है जिसमें कोई बंदा / बंदी बिना किसी दूसरे ब्लॉगर की पोस्टों में छिद्रान्वेषण किये अपनी पोस्ट निकाल ही नहीं पाते। या कभी कभार लिखे भी तो पोस्ट-दर-पोस्ट किसी न किसी ब्लॉगर की पोस्ट से सटती हुई लगेगी, फलाने वहां कहे, ढेकाने यहां कहे इसलिये मेरा मत मैं अपने ब्लॉग पर प्रकट करता हूं।

     इस तरह के ब्लॉगरीय इन्सपिरेशन या दूसरे शब्दों में कहूं तो भिखमंगेपन से मैं भी दो चार हुआ लेकिन बहुत कम। कभी कभार की भी तो टोटेलिटी में लेकर .....पलटदास, ओढ़निया ब्लॉगिंग, पुरस्कारीलाल वाली पोस्टें इसी कैटेगरी की थीं। वहीं कुछ पोस्टें ब्लॉगरों को संबोधित करते भी थी लेकिन वह भी तब जबकि ज्यादातर लोग मुंह में दही जमाकर बैठे थे। जानते सब थे कि गलत हो रहा है लेकिन नाहक झंझट न करने की सोच चुप रहे। लेकिन मुझे तो मौज लेनी थी सो ले ली। आजकल चल रहे "गैंग्स ऑफ वासेपुर" के तर्ज पर कहूं तो मैने उस तरह की पोस्टों में कईयों की "कह के ली"। आप सोच रहे होंगे कि अपने मुंह मिंया मिट्ठू बन रहा हूं, खुद की तारीफ किये जा रहा हूं तो बहुत संभव है आपकी बात सच भी हो। फिलहाल तो झूठमूठ की इंटेलेक्चुएलिटी ठेलने से अच्छा है कि अपने किये पर खुश हो लिया जाय, थोड़ा आत्ममुग्ध हुआ जाय, वैसे भी लंबी-लंबी फेकने वाले यहां बहुतायत में हैं, थोड़ी सी मेरी भी झूठ-सांच पढ़ ल्यौ यार :)

        हां, लगे हाथ एक और बात की ओर इशारा कर दूं, खास करके ऐसे लोगों के लिये जिनके मेरूदण्ड में विनम्रता का उत्स कुछ ज्यादा ही रहता है। तो ऐसे प्राणियों से इतना ही कहनाम है कि ब्लॉगिंग में उतनी ही विनम्रता रखें, उतनी ही दर्शायें जितने की आवश्यकता हो। ज्यादा विनम्र होने पर लोग कान पकड़कर इस्तेमाल भी कर लेंगे और बाद में केवल हें हें करके खींस निपोरने के सिवा और कुछ न कर पायेंगे। इस बारे में मैंने पहले भी एकाध जगह लिखा है कि हम अपने जीवन में चाहें तो निन्यानबे फीसद विनम्र रहें लेकिन एक पर्सेट का दंभ जरूर रखें क्योंकि यही एक परसेंट का दंभ आपके बाकी निन्यानबे फीसदी विनम्रता की दशा और दिशा निर्धारित करता है। इसी दंभ के चलते जिसे जहां जैसा लगे मन की कहा जा सकता है, जिसे टरकाना हो टरकाया जा सकता है और जिसे डांटना हो बेखटके वहां डांटा जा सकता है लेकिन यह डंटैती भी तभी फबती है जब बंदा / बंदी अपने दम खम पर ब्लॉगिंग करता हो न कि हीही फीफी और नेटवर्किंग फेकवर्किंग के चलते। यहां मैं उन "सदा-सर्वदा उखड़ै हैं" टाईप ब्लॉगरों की बात नहीं कर रहा, ऐसे ब्लॉगर बंदे-बंदीयों के उखड़ने-पखड़ने की लोग अब वैसे भी परवाह नहीं करते। यह एक तरह से अच्छा संकेत है कि लोग किसी की निजी खुंदक, मतिमूढ़ता, धौंस आदि को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। जिसे जैसा मन आये लिखता है, पढ़ता है। ऐसे में क्या दबना-दुबना।

      अब बात अभी कुछ दिनों पहले गिरिजेश जी के सर्वप्रिय ब्लॉगों के चयन कार्यक्रम की जिसमें सफ़ेद घर भी चयनित हुआ था। जब चुनिंदा दस ब्लॉगों में सफ़ेद घर का नाम आया तो अच्छा तो लगा ही लेकिन मन तिक्त भी हुआ उन चिलगोजइयों से जिनमें कहा गया कि एलिट ब्लॉगर है, फलां हैं ढेकां हैं। उस पर कई जगह और कई तरह से बहसें हो चुकी हैं इसलिये उसपर ज्यादा न कहते हुए मैं उन स्नेहीजनों के प्रति बहुत-बहुत आभार प्रकट करता हूं जिन्होंने सर्वप्रिय ब्लॉगों की लिस्ट में सफ़ेद घर को भी शामिल किया....औऱ उन्हें भी आभार जिन्हें मेरा ब्लॉग अनुपयुक्त लगा क्योंकि मेरा खुद का मानना है कि ऐसे ढेरों ब्लॉग हैं जो मुझसे भी ज्यादा अच्छा लिखते हैं, उनकी थीम अच्छी है, सोच अच्छी है लेकिन चयन प्रक्रिया में नामांकित न हो पाये या कहीं न कहीं हम ही चयन करने में चूक गये। इस कवायद में चयन प्रक्रिया की अपनी सीमाएं भी थी लेकिन गिरिजेश जी ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की ताकि लोगों को चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाय, उनकी बातों का मान रखा जाय।  खैर, इन तमाम बातों पर मची बमचक के आलोक में हाशिम रजा का शेर बहुत सटीक लग रहा है जिसमें वे कहते हैं कि

महफ़िल में लोग चौंक पड़े मेरे नाम पर
तुम मुस्करा दिए मेरी कीमत यही तो है :-)

 हां,  बमचक से याद आया कि अभी कुछ समय पहले ही बमचक सीरीज सफ़ेद घर में शुरू हुई है। उसकी कुछ पोस्टें हिडन तौर पर लिखी जा रही हैं तो कुछ प्रकट तौर पर सफ़ेद घर में पब्लिश भी होंगी। कुछ पोस्टों के पब्लिश न होने का कारण है मेरी वह फिल्म स्क्रिप्ट जिसके कुछ अंश इसी नाम से रजिस्टर्ड हैं और उसके मूलप्लॉट को तब तक प्रकट करना ठीक नहीं जब तक कि उसका फिल्मीकरण न हो जाये या प्रिंट में न आ जाय। कोशिश रहेगी कि बमचक दोनों रूप में लोगों के सामने लाया जाय। हांलाकि इसमें गालीयां हैं, भदेस बतकूचन है, देशज तंज है जिन्हें आम बोलचाल में असंस्कृत या अशिष्ट भी कहा जाता है लेकिन यही तो जमीनी भारत है, कहीं न कहीं हम रोज इस तरह की भाषाओं से रूबरू होते हैं। और फिर बमचक तो बमचक है । लिख इसलिये रहा हूं कि मुझे पता है कि इस तरह के बमचक साहित्य लिखने की एक उम्र होती है.......बुढ़ौती में बमचक नहीं लिख सकता क्योंकि बुढ़ौती शुचिता और शालीनता का ओढ़ना ओढ़कर दूसरों के लिखे बमचक को कोसने की उम्र है :-)

    अंत में अपने चार सैकड़े वाली इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूं। आशा है सुधीजन बुरा न मानेंगे, और जिन्हें बुरा लगे वो बमचक पढ़ लें,   हो सकता है उसके भदेसपन को देख बुरा मान लेने वाला पैमाना और ज्यादा  उपर की ओर  उठे  :-)

- सतीश पंचम

( सभी तस्वीरें  जौनपुर के एक मेले की हैं जिन्हें अपने कैमरे से मई-2012 में  'हिंचा' था )

36 comments:

Er. Shilpa Mehta said...

बढ़िया है जी - बधाई है जी :)

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बस हम भी आपके साथे साथ लगे हैं, 4 वर्ष पूर्ण होने को है। शुभकामनाएं

अनूप शुक्ल said...

बधाई हो जी। चार साल और चार सौ पोस्टें पूरी होने के लिये।

अपनी तारीफ़ में आत्मनिर्भरता होना आजकल के जमाने जिन्दा रहने के लिये बहुत जरूरी है। सो आप आत्मनिर्भर भी हो लिये अच्छा है।

वो आपका एक परसेंट बरकरार रहे इसके लिये शुभकामनायें।

कमेंट बक्सा बंद करने और फ़िर जनता की बेहद मांग पर खोल देने की कहानी रह ही गयी।

सफ़ेदघर की देसज पोस्टें, बमचक, बतकूचन वाली शानदार होती हैं। समसामयिक पोस्टों पर तात्कालिकता जरा हावी हो जाती है सो वे पोस्टें जरा ’क्या खूब लिखा है’ टाइप की हो जाती हैं।

सिनेमा वाली कुछ पोस्टें बहुत शानदार रही हैं। फोटोग्राफ़ी वाली तारीफ़ भी यहीं कर दें क्या? :)

एलीट ब्लॉगर होने के डर से क्या बतकूचन/ चिरकुटई की बातें करना छोड़ दोगे? नहीं न! :)

एक बार फ़िर बधाई ले लीजिये। शुभकामनायें च!

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बढ़िया लिखा है.

पलक के ज़िक्र से याद आ गया कि नीशू तिवारी के ब्लौग पर अभी भी उसके मस्त कमेन्ट जिंदा हैं. दो उदाहरण:

१. मिथिलेश सर आप आ गए। सुकून मिला। आप इतना ज्‍यादा मत सोया करो। आजकल जो सोता है, वो खोता है और मुझे मालूम है आप खोते नहीं हो। आप नीशू सर के दाहिने हाथ हो। आप जल्‍दी से नीशू सर के सम्‍मान में लिखी कविता पर अपनी जोरदार दमदार ऐसी टिप्‍पणी करो कि उनकी नींद उड़ जाए, जिनकी उड़ाना चाहते हैं और पहले से ही उड़ी हुई है। बहुत गांधी बनते हैं। कोई उखाड़ेगा कैसे, मैं हूं न सबकी सुरक्षा के लिए। मैं पहले ही उखाड़ लूंगी। जस्‍ट किडिंग मिथिलेश सर।

२. आज रात पढि़ए ब्‍लोग जगत के महारथी महामानव फुरसतिया सर को समर्पित कविता। दोबारा याद नहीं कराऊंगी। खुद ही आ जाना अगर मौज लेनी हो, अब तक तो वे ही लेते रहेंगे, देखिएगा कि देते हुए कैसे लगते हैं फुरसतिया सर।

क्या दिन थे वो भी...

संजय @ मो सम कौन ? said...

ढेरों ढेर बधाईयां है जी, चार साल की भी, चार सो पोस्ट की,भी, बमचक की भी| ये उपलब्धि कम नहीं है, वो भी तब अगर आप यहाँ प्रसिद्धि पाने के लिए मार्केटिंग टूल्स का इस्तेमाल नहीं कर रहे| विवेकी राय जी से मुलाक़ात वाली सादा पोस्ट इसकी गवाह है|
अपनी फोन पर हुई इकलौती बातचीत में आपकी कही एक बात कई बार याद आती है, "यार, मैं ज्यादा देर गुस्से वाले मूड में रह ही नहीं पाता" :) रहना भी नहीं चाहिए|
पलक. पुरस्कारी लाल. पलटदास वाली भी अपनी पसंदीदा पोस्ट्स रही हैं, 'प' से ज्यादा प्यार दिखता है पंचम दादा को:) बात ब्लोगरीय भिखमंगेपन की ही नहीं है, अपना नजरिया दिखाने की भी है| इसके अलावा वैलेनटाईन बाबा वाली, कच्छा वाली, वरदेखुआ वाली, एक राजनैतिक व्यंग्य जिसमें एक बरात का वर्णन था कुछ जिसमें 'प्याज की सलाद' शायद और अनगिनत पोस्ट्स बहुत पसंद रही हैं| फिल्म समीक्षा की विधा में आप सीरियसली हाथ आजमा सकते हैं|
पार्टी कब, कहाँ और कैसे? मुझे 'क' से ज्यादा प्यार है:)

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की ई-मेल से प्राप्त प्रतिक्रिया -

मुबारकाँ जी। इस स्पीड से 4000 पोस्ट 36 वर्ष बाद पूरे होंगे तब हमलोग दन्तहीन मुँह बाये आहें भरते पोस्ट कम्प्यूटर को डिक्टेट किया करेंगे। लार टपकती रहेगी और हुस्न देख दुहराया करेंगे:
हाथों में ग़र जुम्बिश नहीं नाक में तो दम है
रहने दो अभी जाम-ओ-मीना मेरे आगे।
'आँख' इसलिये नहीं लिखा कि तब तक मोतियाबिन्द वगैरह से धुँधला चुकी होंगी। बुढ़ौती में आँख, कान और जीभ तक को जबाब देते सुना है लेकिन किसी की नाक जबाब दे गई हो, सूँघ न पाये; नहीं सुना।

Abhishek Ojha said...

झाडे रहिये... बढ़ते रहिये. हेंचे रहिये :)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वो ज़माने भी याद हैं, वो ब्लॉग्स, पोस्ट्स, और टिप्पणीकार भी। कितना भोलापन है हिन्दी ब्लॉगर "परिवार" में, चलते कोल्हू में अपना हाथ पेर देने की हद तक का भोलापन। लिखते रहिये, चार साल, 400 पोस्ट क्या ऐसे ही न जाने कितने साल और कितने सैकड़ा पोस्टें और आनी चाहिये। भदेस भाषा के बारे में अभी कोई टिप्पणी नहीं, बची हुई सारी पोस्ट्स बुढापे में पढेंगे। ये एलीट का मामला बड़ा पेचीदा है। 77 के चुनाव में राजनारायण प्रधानमंत्री को हराने के कारण अपने को प्रधानमंत्री पद के सबसे सशक्त दावेदार ही मानते थे, सो इलीट हो गये। आजकल सोनिया गान्धी से प्रेरणा लेकर हर मंत्री के घर की बहू अपने को भारत की सर्वशक्तिमान मानती हैं, इसलिये वे इलीट हैं। हमें तो ऐसा इलीटवाद समझ नहीं आता। हाँ, बमचक (और अन्य) फ़िल्मीकरण का बेसब्री से इंतज़ार है। आशा है तब ऑटोग्राफ़ मांगने आने पर आप हमें पहचान लेंगे। हम तो शंखनाद से पहले ही जय बोलते हुए हियाँ से निकल लें कहीं दम्भ की टेस्टिंग होने लगी तो बनते-बनते मामला बिगड़ न जाय।

singhSDM said...

पंचम जी
इस उपलब्धि के लिए बधाई. जिन प्रतिमानों के सहारे इस उपलब्धि को अर्जित किया है उसे बनाये रखिये. दिल को छु लेने वाले शेर और जौनपुर मेले में "हिंची" तस्वीरों ने पोस्ट का मज़ा दुगुना कर दिया.

सतीश पंचम said...

@कहीं दम्भ की टेस्टिंग होने लगी तो बनते-बनते मामला बिगड़ न जाय।
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का अनुराग जी, दम्भ तो उन लोगों के लिये है जो किसी को भी सीधा जानकर एडवांटेज लेना चाहते हों, कुछ भी कहकर निकल जाने की ख्वाहिश रखते हों, या रूआब गाँठना चाहते हों कि देखो मेरी इतनी चलती है.....ऐसे जीवों के लिये एक परसेंट दंभ रखना जरूरी है ताकि आत्मसम्मान बना रहे, सामने वाला भी एलर्ट रहे कि यह बंदा उस टाईप का नहीं है जैसा कि औरों को समझ रखा था :)

फिर वो 99 परसेंट की विनम्रता भी तो है जो कि उस एक परसेंट से कहीं ज्यादा और रचनात्मक है :)

सतीश पंचम said...

@ पार्टी कब, कहाँ और कैसे? मुझे 'क' से ज्यादा प्यार है:)

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संजय भाई, इस तरह मत कहिये वरना ढोबले की रेड पड़ जायेगी....बता दूं कि मुंबई में आजकल वसंत ढोबले नाम के पुलिसवाले की रेड जमकर चल रही है....कई लोग पकड़े गये हैं पार्टी शार्टी के नाम पर.....हम आप धर लिये गये तो आपके यहां तो 'गुत' ही कट्टणी है अपना तो की हाल होणा सो तु्हानूं नईं पता :)

smt. Ajit Gupta said...

पहले तो आपको टोकरा भरकर बधाई। आपकी बमचक पढने से चूक गयी। लेकिन नि:संदेह शेष रचनाओं की तरह आनन्‍द देने वाली ही होगी। आपकी पोस्‍ट अलग ही आनन्‍द देती है। बधाई।

सतीश पंचम said...

@ एलीट ब्लॉगर होने के डर से क्या बतकूचन/ चिरकुटई की बातें करना छोड़ दोगे? नहीं न! :)
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अनूप जी,

ये एलीटनेस वाला पहाड़ा भी ज्यादातर उन्हीं की ओर से पढ़ा जा रहा है जिनकी खुद की एलीटनेस का ढक्कन न जाने कब से खुला हुआ है, गंधा रहा है :)

वैसे अपन ने तो पहले भी यही बात कही है कि - हम धूसर देहात भी उसी अंदाज में रचते हैं जिस अंदाज में क्लिष्टावली। सो एलीटनेस फेलीटनेस का टंट-घंट मायने नहीं रखता :-)


@फोटोग्राफ़ी वाली तारीफ़ भी यहीं कर दें क्या? :)


Thoughts of Lense पर कुछ तस्वीरें जरूर लाने का विचार था लेकिन कुछ तो मेरे आलस और कुछ तो मेरे 'फिर से आलस'.....की वजह से नहीं पब्लिश कर सका :)


@ अपनी तारीफ़ में आत्मनिर्भरता होना आजकल के जमाने जिन्दा रहने के लिये बहुत जरूरी है।

सत्यवचन प्रभो !

@ कमेंट बक्सा बंद करने और फ़िर जनता की बेहद मांग पर खोल देने की कहानी रह ही गयी।

अरे उतना ही नहीं, बहुत कुछ रह गया है.. चार सौ में से छांटने लगूं तो बीस-पच्चीस पोस्टों की अलग से कतार रखनी पड़ेगी :)

Ravishankar Shrivastava said...

बधाई, और बमचक के लिए शुभकामनाएं.

रहा सवाल बेबी पलक और बाबा पलटदास का, तो ऐसे व्यक्तित्व तो अजर अमर होते हैं, सर्वकालिक और सार्वभौमिक होते हैं. बस, अब भीड़ में गुम हो गये हैं - क्योंकि हिन्दी चिट्ठे लाख की संख्या से भी आगे बढ़ चुके हैं. अब इनके नोटिस कोई नहीं लेता, या दूसरे शब्दों में ये नोटिस में भी नहीं आते चाहे कितना बमचक मचाएं! :)

anshumala said...

अपना तो रिवाज है की सुखा सुखी बधाई नहीं देते है जिससे चाहिए तो पहले वो मिठाई ( कम से कम खेत पर बना गुड तो हो ) के साथ खबर दे तो बधाई , पर ब्लॉग जगत का रिवाज ये नहीं है सो हमारी तरफ से भी बधाई ले लीजिये ! पहले रिवाज के अनुसार तारीफ करते है, गांव से जुड़ा होना वो भी उत्तर भारत से मेरा आप के ब्लॉग से जुड़ने का कारण बना इस तरह की बहुत सी पोस्टे मुझे खुद को अपने शहर के आस पास जुड़ा हुआ महसूस कराती थी साथ ही मुझे याद रखवाती थी की मेरी जड़ कहा है वो सारी पोस्टे पसंद आई, साथ में राजनीति से जुड़े कई व्यंग्य भी | ( अब अपनी पर आती हूं आलोचना वाली आदत, दंभ कितना है इसमे आप खुद ही प्रतिशत निकाल लीजियेगा ) वो सारी पोस्टे जिस पर आप ने भदेश, गांव से जुड़ा जमीन से जुड़ा बिलकुल असली कह कर जम कर गाली गौलौज को लिखा वो मुझे अच्छी नहीं लगी, ( कुछ को पढ़ा था बाकियों पर तो आप ने पहले ही कह दिया की मत पढियेगा सो नहीं पढ़ा ) बिना गाली के आखिर वही सब कुछ आप अपनी कई पोस्टो में कह चुके थे बिल्कुल जमीन से जुड़े रह कर जिसके कारण मै आप के ब्लॉग से जुडी, इसलिए मुझे नीजि रूप से कभी ये नहीं लगा की आप को देहाती होने और गांव का होने का साबित करने के लिए गाली लिखने की जरुरत है , बिना गाली वाली के भी आप का गांवो से जुड़ा होना दर्शाता है | उम्मीद करती हूं गालिया अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए बचा कर रखेंगे और जब वो फिल्म टीवी पर बीप बीप की आवाज के साथ आयेगा तो हम सब देख लेंगे |

anshumala said...

कंजूसी और पार्टी ना देने के बहाने तो खूब देखा है पर ये पहला मामला है जो किसी दिल्ली के आसपास बैठे व्यक्ति तो मुंबई के ढोबले का डर दिखाया जा रहा है मतलब ये तो बहाने की हद ही है !!!! अब संजय जी को पढ़ने के लिए मिड डे भेजिए तब तो ढोबले के भूत से डरेंगे !!!!

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

बहुत बहुत आभार इतने खुले रूप से बात कहने हेतु :)

यह सच है कि बमचक वाली बातें बिना गाली गलौज के भी लिखी जा सकती थीं और मैंने पहले इसी तरह की पोस्टें लिखा भी है। लेकिन यहां बमचक में गाली गलौज रखने का मंतव्य कुछ उस दौर को भी दिखाना है जो कि हम देखते हुए भी नहीं देखना चाहते। इस बार जौनपुर गया था तब घर की गाड़ी होने के बावजूद मेले में जान बूझकर एक सवारी जीप में गया था और वहां महसूस हुआ था कि हम कितना तो उपरी तौर से दुनियां जहां को जानें हैं। तरह तरह के दृश्य, चोर चाईं, उनके बीच होने वाली आपसी छिनैती, हत सारे...धत सारे वाली खिचपिच....

उसी मेले में देखा गाँव की महिलायें जीप वाले ड्राईवर को जल्दी न चलने के लिये जमकर विशिष्ट अंदाज में गरिया रहीं थी और ड्राईवर एक सवारी...एक सवारी की पुकार लगा रहा था....।

यहां उस माहौल को रच तो नहीं सकता लेकिन वो विशिष्ट किस्म की गाली ही थी जिसने उस भदेस रूपक को साक्षात सामने ला दिया। बमचक के जरिये कुछ उसी तरह के माहौल को रखने का मन किया। कोशिश रहेगी कि गालीयां जहां जरूरी लगें वहीं दिखें।

वैसे आप की वह टिप्पणी मुझे भूली नहीं है जब आपने बमचक पर पहली बार कमेंट किया था.... उसी का असर है कि आगामी कुछ पोस्टें हिडन चल रही हैं :) अबकी जब कभी लगेगा कि बमचक की फलां कड़ी में कुछ भी अश्लीलता है तो जरूर पहले ही पोस्ट में इंगित कर दूंगा ।
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वसंत ढोबले के बारे में संभवत दिल्ली के लोग भी सुन चुके होंगे यही Media यहां भी कान खाता है वही वहां भी कान खाया होगा :-)

आशीष श्रीवास्तव said...

हम अभी पढ़ रहे हैं, पोस्ट और टिप्पणी दोनो।

KAVITA said...

bahut badiya jiwant photoes ke saath sundar prastuti..aabhar!

rashmi ravija said...

बहुत बहुत बधाई...सतीश जी...४०० पोस्ट्स लिख लीं...और साथ में हिडेन पोस्ट भी लिखना जारी है....इत्ता सारा कैसे लिख लेते हैं...
पर आपकी पोस्ट हमेशा रोचक होती हैं...कई नए शब्द से परिचय हुआ यहाँ...
गाँव की जीवंत तस्वीरें तो हमेशा ही आपके ब्लॉग का आकर्षण बनाए रखती हैं...
सालो साल लिखते रहें ऐसे ही..

सतीश पंचम said...

Ashish Shukla जी की ई-मेल से प्राप्त प्रतिक्रिया...


सतीश जी इसे पढ़कर मै लोटपोट हो गया हूँ बेहद ही उम्दा. बमचक बेहतरीन रहा और वाकई में इसे पढ़कर मुझे मेरा गाँव याद आ जाता है.
और 400 पोस्ट के लिए बधाई.
जिया हो बिहार के लाला

सादर
आशीष शुक्ला
आपका पाठक

लिख इसलिये रहा हूं कि मुझे पता है कि इस तरह के बमचक साहित्य लिखने की एक उम्र होती है.......बुढ़ौती में बमचक नहीं लिख सकता क्योंकि बुढ़ौती शुचिता और शालीनता का ओढ़ना ओढ़कर दूसरों के लिखे बमचक को कोसने की उम्र है :-)

अंत में अपने चार सैकड़े वाली इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूं। आशा है सुधीजन बुरा न मानेंगे, और जिन्हें बुरा लगे वो बमचक पढ़ लें, हो सकता है उसके भदेसपन को देख बुरा मान लेने वाला पैमाना और ज्यादा उपर की ओर उठे :-)

कौशल किशोर मिश्र said...

satyam ,sivam,sundram,

badhai ho...4,saal banaam 400,posts,

kabhi kabhi ham aap ke lekhani ke saath gaon ki mitti se jud jaate hai..


jai baba banaras...

दीपक बाबा said...

चार साल और चार सौ पोस्टें पूरी होने के लिये बधाई हो जी

शुभकामनाएं....

भाई हम तो मौज लेने आते है - सफेद्घर में बिना चाय पानी के लालच से.

वाणी गीत said...

सबसे पहले तो बधाई स्वीकार करें ...
बिना किसी ब्लॉगर /पोस्ट को लक्ष्य बनाये लिखना भी एक कला है और इसके बिना भी चार सौ पोस्ट निकाल लेना आपकी उम्दा कलाकारी ...बधाई फिर से !
'इंटेलेक्चुअल भिखमंगापन', पढ़ते हुए मुस्कराहट आई .आभार !

सतीश पंचम said...

बहुत बहुत धन्यवाद वाणी जी,

दरअसल मेरी एक-दो पोस्टें ऐसी जरूर हैं जहां किसी खास ब्लॉगर को लक्षित किया गया किंतु उसमें टोटेलिटी का पुट बना रहा :)

इनमें एक तो वो पोस्ट थी जोकि "ब्लॉगिंग में टसुए बहाने के हुनर" पर केन्द्रित थी :)

प्रवीण पाण्डेय said...

जब तक मन कुछ कहने के लिये प्रेरित करता रहे, लिखते रहिये। अब लिखना आपकी विवशता है क्योंकि पाठकों को आपकी आदत जो पड़ गयी है।

मन की मौज लिये लिखिये,
दर्द ठहरा हो, तो लिखिये,
संवाद न बहे मन से, नयन से,
शब्दों को ठेलिये, तब लिखिये।

अतिशय बधाईयाँ..हजारीलाल शीघ्र बने..

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ई पोस्ट भी बमचक है। बमचक तो बमचक है ही तश्वीरें भी बमचक है।

...चकाचक चल रही चिठ्ठा लिखाई के लिए चउचक बधाई।

सतीश पंचम said...

Jitendra जी (http://www.blogger.com/profile/06299200941573468100 )आपका कमेंट अप्रूव तो हुआ लेकिन दिख नहीं रहा, न स्पैम में है न अवेटिंग लिस्ट में। हां, फॉलोअप कमेंट में जरूर दिखाई दे रहा है. सो वहीं से कॉपी पेस्ट कर रहा हूं
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congrats sir for your 400 post. As i am a regular follower of your blog hope this will continue in future with same passion and colours of life

Posted by jitendra to सफ़ेद घर at 30/6/12 3:30 PM
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anshumala said...

सतीश जी
आप तो मेरी टिप्पणी पर गंभीर हो गये मेरा फर्ज भी बनता है की मै भी अपनी बात और साफ करू ( वैसे वजह ये भी है की इसले पहले की अनुराग जी मुझे पर कोई ताना कसे की मेरी शिकायत पर अंशु जी को शिकायत है और यहाँ खुद शिकायत कर रही है ) आप की इस बात से बिल्कुल सहमत हूं की किसी चरित्र को उभारने के लिए कभी कभी गाली जरुरी होता है इसलिए मैंने भी आप से कहा है की अपनी स्क्रिप्ट में आप आराम से गाली लिखिए क्योकि वहा चरित्रों को सही तरीके से दिखना पड़ता है | अपनी कहु तो मै शाकाहारी हूं एक दिन रेस्तरा में गई और वहा जो सूप पी रही थी मुझे लगा की उसमे मिट का टुकड़ा था तुरंत थूक दिया पर मन बड़ा ख़राब हो गया और महीनो तक रहा ,उसी तरह आप लिखते तो हाथ से है पर जब हम उसे पढ़ते है तो वो शब्द हमारे मुँह में चला जाता है , जब पहली बार आप की वो पोस्ट पढ़ी जिसमे आप फिल्म में गालियों को गाली दे रहे थे बिना किसी हिचक के पूरी पोस्ट धड़ा धड पढ़ डाली और नतीजा ये हुआ की जैसे कभी कभी कोई गाना जबान पर अटक जाता है उसी तरह वो सारे शब्द जबान पर कई दिन तक अटके रहे, तो बार बार ख़राब लगता था | जब छोटी थी तो गालिया पाप माना जाता था फिर वो बुराई बना गया और आज महज गन्दी आदत से ज्यादा गालिया कुछ नहीं है | आप ने हम जैसे पाठको को ध्यान में रख कर अपनी अगली पोस्ट में ऊपर चेतावनी लिख दी ये ही बड़ी बात है उसके लिए धन्यवाद ! वैसे मै इस बात की हमेसा हिमायती रही हूं की लेखक को कुछ भी लिखने से रोकना नहीं चाहिए इसलिए मेरी बात को अपनी आलोचना, बुराई या मेरी शिकायत के रूप में ना देखे , बस एक पाठक ने अपनी परेशानी बताई है |

Girish singh said...

ब्लॉग पढता हु तो लगता हैं तन्मय से लेकर सरोखन तक आस पास ही हैं ..जब कमेन्ट
पढता हूँ तो आउटसाइडर टाइप फीलिंग आती हैं ..मतलब अमूमन सारे ब्लोगर्स के हैं
कमेन्ट होते हैं ज्यादातर | पुनः धन्यवाद देना चाहूँगा शिव मिश्रा भैया का जिनके माध्यम
से मैं आप को जान और पढ़ सका | हार्दिक शुभ कामनाए... बमचक के इंतजार में ...गिरीश

सतीश पंचम said...

@ लेखक को कुछ भी लिखने से रोकना नहीं चाहिए इसलिए मेरी बात को अपनी आलोचना, बुराई या मेरी शिकायत के रूप में ना देखे , बस एक पाठक ने अपनी परेशानी बताई है |

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अंशुमाला जी,

समझ सकता हूं कि कैसी असमंजस की स्थिति हो जाती है इस तरह अचानक से ही कोई अनचाही पंक्तियां या शब्द पढ़ने या सुनने से, जबकि आदत न हो तो और भी ज्यादा खटकता है। कोशिश करूंगा कि बमचक की वे सभी पोस्टें जिनमें कहीं कुछ भी इस तरह का कंटेंट आये तो डिस्कलेमर जरूर लगा दूं ताकि पाठक सतर्क रहें।

सतीश पंचम said...

गिरीश जी,

बिल्कुल आउटसाईडर मत फील किजिए। बेहिचक पढ़िये पढ़ाईये। यह ब्लॉगिंग धीरे धीरे अब महायज्ञ का रूप लेते जा रही है, सभी लोग इस महायज्ञ में लिख पढ़के अपनी ओर से योगदान दे रहे हैं, लेखों के रूप में, विचारों के रूप में, भावों के रूप में यज्ञाहुति दे रहे हैं आईये आप भी जुटिये इस महायज्ञ मे शामिल होइये...ब्लॉग बनाइये, लिखिये-पढ़ाइये :)

प्रवीण शाह said...

.
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बहुत बहुत बधाई सतीश पंचम जी,

आपको पढ़ना हर बार मुझे कुछ नया देता है... कहाँ से लाते हैं यह वैरायटी...

आपकी साफगोई कायम रहे कम से कम अगली ४००० पोस्टों तक... इसी कामना के साथ..


...

GYANDUTT PANDEY said...

हम ये ब्लॉग भी घूमे, वो ब्लॉग भी हो आये
ऐ यार मगर तेरा ब्लॉग; तेरा ब्लॉग ही है।

सतीश पंचम said...

:)

सतीश पंचम said...

आप सभी के स्नेहिल प्रतिक्रियाओं को देख मन गदगद हो गया । दू लीटर खून बदन में अउर बढ़ गया है :)

एही झोंक में बमचक की नौंवी कड़ी भी पब्लिश कर दिये । हांलाकि पांच हिडन पोस्ट को जोड़ कर यह चौदहवीं कड़ी है लेकिन कहीं कोई कन्फ्यूजन न हो इसलिये पब्लिकली पोस्ट हुई कड़ियों के अनुसार ही क्रम संख्या नौं दिया जा रहा है।

एक बार पुन: आप सभी के स्नेहिल प्रतिक्रिया हेतु बहुत-बहुत आभार। उम्मीद है कि आप लोगों के आशानुरूप इसी तरह लेखनी जारी रहेगी और आप सभी का 'नेह-छोह' अइसे ही बना रहेगा :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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