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Monday, August 27, 2012

'स्वर्ग' में भी मैगी !

सड़क के किनारे सटा बर्फीला प्रदेश, khardungla
       लद्दाख, जिसके बारे में केवल किताबों में अब तक पढ़ा करते थे, या बहुत हुआ तो टीवी या कहीं नेट पर कभी-कभार कुछ देख-ताक लिया करते थे, वहीं अबकी हम भी अपने कलीग्स के साथ हो आये।  वहां न अखबार, न टीवी, न नेट कुछ नहीं। उंचाई के साथ मोबाइल भी दिन में एक दो घंटे से ज्यादा नेटवर्क नहीं देना चाहता था मानों एक आग्रह सा कर रहा हो कि - "आये हो तो प्रकृति का पूरा मजा लो, ये प्राकृतिक सौंदर्य जाने फिर कब देखने मिले" ? सो, हम सभी रम गये उस स्वर्गीय नज़ारे का आनंद लेने में। हां, उस दुर्गमता को देखते हुए मन में कई बार चीनी तीर्थयात्री ह्वेनश्वांग का ख्याल आया कि उस दौर में कैसे आया होगा वह तीर्थयात्री जबकि सड़क आदि की सुविधा भी नहीं थी। माना कि रेशम मार्ग उस दौर में मौजूद था लेकिन....फिर भी....कैसे आया होगा ?



Tsomoriri Lake, Ladakh

     उधर कहीं-कहीं केवल पहाड़ ही पहाड़ दिखे तो कहीं बर्फ़ ही बर्फ़। कुछ जगहों पर याक चरते नज़र आये तो कहीं ढेर सारे घोड़े,  वह भी बिना किसी लगाम या रस्सी से बंधे, बिल्कुल स्वछंद। ड्राईवर से पूछा कि ये घोड़े जंगली हैं या पाले हुए। तो बंदे ने बताया कि ज्यादातर पाले हुए हैं। कभी-कभार जंगली घोड़े भी दिखाई देते हैं लेकिन वो पहली ही नज़र में पहचान में आ जाते हैं। यहीं कहीं इन घोड़ों का मालिक तंबू में होगा। शाम तक सभी घोड़े गोल बाड़े में खुद-ब-खुद आ जाते हैं। आश्चर्य हुआ कि इस दुर्गम प्रदेश में घोड़े खुद-ब-खुद लौट आते हैं जबकि चाहें तो इतना विस्तृत प्रदेश है कि अपने मालिक से दूर चाहे जहां तक निकल जांय, मालिक न पकड़ पायेगा। हां, ये जरूर हो सकता है कि कोई दूसरा घोड़ा मालिक उन्हें पकड़ ले। रास्ते में कहीं-कहीं घोड़ों को पैर में रस्सी फंसाकर गिराते और फिर उनके पैरों में नाल ठोकने का उपक्रम भी देखने मिला।

highest Cafetaria in the World, Khardungla

      रास्ते में कुछ जगह ठहर कर मैगी का भी आनंद लिया। मैगी, जिसके बारे में अक्सर बाबा रामदेव को बहुत शिकायत रहती है, उन्हें एक बार हिमालय के इन पहाड़ों में भी हो आना चाहिये। देखते कि कैसे वहां और कुछ खाद्य मिले न मिले मैगी जरूर मिलती है और सैलानियों की पहली पसंद भी यही रहती है क्योंकि या तो स्थानीय खाने से सैलानी अपना तादात्मय स्थापित नहीं कर पाते या फिर कभी आलू आदि की इच्छा हुई भी तो आलू आसानी से पक नहीं पाते। अत्यधिक उंचाई आड़े आ जाती है, जबकि मैगी एवरेडी है। जब चाहे तब टटक अंदाज में उपलब्ध। वो एक मारूति सर्विस सेन्टर का ऐड आता था न, जिसमें कि वीराने में दो बंदे एक पहाड़ी लड़के से पूछते हैं – ये है , वो है, फलां है, अलां है और लड़का हर प्रश्न का जवाब ना मे देता था। लेकिन जैसे ही मारूति सर्विस सेन्टर के बारे में पूछा जाता है लड़का हां कहता है। दोनों बंदे हैरान होते हैं कि इस वीराने में मारूति सर्विस सेन्टर उपलब्ध है। ठीक वही स्थिति हमारी हुई थी जब बेहद दुर्गम इलाके में भी हमें मैगी देखने मिली। लोग बड़े चाव से मैगी का आनंद लेते दिखे। बाबा रामदेव, या तो आप कुछ मैगी सा खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराओ जो हिमालय के इन दुर्गम स्थानों पर भी पहुंच सके, पक सके या फिर कुछ और मुद्दे उठाओ। हां, शीतल पेय यहां भी मिले लेकिन बहुत कम। लोगों को जरूरत भी क्या है। वैसे ही माहौल शीतल-शीतल रहता है।
पहाड़ों से खिसकती रोड़ी

रास्ते में एक जगह पहाड़ों की ढलान से रोड़ी खिसकती नज़र आई। लेकिन वह रोड़ी आगे जाकर हिमांक संगठन द्वारा रखे ड्रमों की जद में आ जाती और वहीं के वहीं फिसलती रोड़ी ठहर जाती। सड़क सुरक्षित। तेल के खाली ड्रमों का सड़क के मैन्टेनेन्स हेतु कैसे बेहतरीन इस्तेमाल किया जाता है यह देखने लायक है।

एक और चीज जिसने ध्यान खेंचा वह था यहां बहने वाली सिंधु नदी जिसके बारे में केवल किताबों में ही देखते-पढ़ते आये थे। सिंधु घाटी की सभ्यता, हड़प्पा, मोहन-जोदड़ो की सभ्यता, सभी कुछ जैसे जेहन में एक-एक कर आने लगे। एक जगह गाड़ी रोककर उसके बेहद ठंडे पानी को अंजुलीयों में भर लिया। अच्छा लगा। रास्ते में श्योक नदी भी दिखी लेकिन वह भाव मन में नहीं आया जो सिन्धु नदी को देख आया था।

सिंधु नदी
करगिल से श्रीनगर की ओर जाते हुए रास्ते में सुरू नदी दिखी जिसकी तेज धारा की आवाज कार का इग्निशन बंद करने पर करीब आधे किलोमीटर दूर से सुनाई पड़ रही थी। करीब जाने पर शर्रर-शर्रर बहती सुरू को देख रोंगटे खड़े हो गये। इत्ती तेज धारा, इतना तेज पानी का बहाव पहली बार देखा था। उन मज़दूरों के प्रति सहज ही श्रद्धा भाव मन में भर आता है जो इतनी तेज बहती नदी के जोखिम के बावजूद वहां सड़क बना ले गये।

Kargil War Memorial
द्रास के उस क्षेत्र में पहुंचने पर जहां करगिल युद्ध हुआ था मन एकाएक उदास हो उठा। करगिल वार मेमोरियल देखने के दौरान यह मन:स्थिति बरकरार रही। अंदर जब मनोज पाण्डेय हॉल में पहुंचे तो सामने ही जैसे वह सारे दृश्य दिखने लगे जो करगिल वार के समय हमने देखे सुने थे। विक्रम बत्रा की तस्वीर भी दिखी – ये दिल मांगे मोर.

उन तमाम वीरों के बीच कई सारे युद्धक मिसाइलों के खोल, बंदूकों की गोलियां और पाकिस्तानी घुसपैठियों (सेना) द्वारा छोड़ कर भागे गये असलहों के अंश भी दिखाई दिये। मन में एक किस्म की खिन्नता का भाव भी आया कि यूं तो हम बहुत अपने काम को लेकर हलकान रहते हैं कि ये काम करते हैं, वो काम करते हैं, बहुत बिजी रहते हैं लेकिन जरा इन सैनिकों के काम को देखा जाय, इनकी जीवन शैली देखा जाय तो हम कहीं नहीं ठहरते। खाने में जरा से कोई बाल आ जाय, या नुक्स दिख जाय तो आसमान सर पर उठा लेते हैं जबकि इनके पास युद्ध के दौरान खाना पहुंचने में ही तीन दिन लगते थे। पूड़ियां बनने के बाद सुखाई जाती थीं और फिर उसके बाद बंडल करके भेजी जाती थीं। और कोई तात्कालिक सुविधा भी नहीं थी कि आग जलाकर उन्हें तुरंता पुलाव जैसा कुछ दिया जाय। इस कठिनाई में जीने वाले और देश की रक्षा में डटे जवानों को देख मन में जहां श्रद्धाभाव उपजता है वहीं अफ़सोस भी होता है कि उज्जड्ड पड़ोसी देशों के चलते यह सब हमारे जवानों को झेलना पड़ता है।
3-idiots Shooting spot

वैसे देखने को तो और भी बहुत कुछ देखे, मोनास्ट्री, गुरद्वारा पत्थर साहिब, मैग्नेटिक हिल, थ्री इडियट का सू-सू प्वाइंट ( वही, जहां चतुर रामलिंगम ने सूसू किया था) वहां अब बाकायदा चिन्हित किया गया है। करगिल में रात भर रूकने के लिये जब होटल तलाशा जा रहा था तो दुकानों के वे शटर दिखाई दिये जिसमें कि गोलियों के निशान अब भी बने हैं, धूप आड़ी तिरछी होकर उन दुकानों में अब भी घुसपैठ करती है। उस होटल के रूम अटेंडेंट से बातचीत करने पर उसने बताया कि वह गुलमर्ग का है। करगिल में केवल नौकरी करता है। रात के आठ बजे जब करगिल बाजार में सैर करने निकला तो -करने के लिये एसटीडी बूथ पर गया तो बीसएनएल के लैंडलाइन वाला बीटल फोन दिखा। अरसे बाद बटन दबाकर पूश बटन फोन इस्तेमाल किया। एक दो बार टूं टूं की ध्विन से पता चला कि ठीक से बटन नहीं दबाया था। पुश बटन लैंडलाइन की आदत छूट जाय तो टूं टूं होनी ही थी। एक फल वाले के यहां रूककर ऐसे ही दाम पूछा तो पता चला केला सत्तर रूपये दर्जन। सेब साठ रूपये किलो। चाय पीने के लिये दुकान ढूंढने लगा ताकि वहां के लोगों से बातचीत करते हुए कुछ अपने लायक कंटेंट निकाल सकूं लेकिन कोई चाय की दुकान नहीं खुली मिली। सब कुछ जैसे दस साल पीछे जैसा लगा। सुबह एक दुकान के खुलने पर देखा वहां टेप रिकार्डर वाले कैसेट बिक रहे थे। पूछने पर बंदे ने बताया कि अब भी यहां कई जगह कैसेट चलता है। सीडी खूब बिकती है। यानि करगिल अभी कैसेट टू सीडी के संक्रमण काल से गुजर रहा है।

                   इस बारे में
Nubra Valley, Ladakh 
 गुलमर्ग के बंदे से पूछा कि करगिल पिछड़ा क्यूं दिख रहा है। मुस्कराते हुए बंदे ने यूं देखा मानों कहना चाहता हो – "आगे बढ़ने की जल्दी किसे है" ?

    कुछ जगह इंटरनेट कैफे भी दिखे। सैलून के नाम देखने पर होठों पर मुस्कान सी आ गई। बॉलीवुड स्टाईल हेयर कटिंग सलून, जुल्फिकार सैलून, लेटेस्ट स्टाईल सैलून। वहां खुबानी खूब बिकती दिखी। श्रीनगर पहुंचने पर डल झील शाम के धुंधलके में घिरा दिखा। रात भर होटल में रहे, अगले दिन डल झील में शिकारे का आनंद लिये। एक हाउस बोट के पास शिकारा ले जाकर कहने लगा – ये मिशन कश्मीर प्वाइंट है। इदर मिशन कश्मीर की शूटिंग होई थी। इधर मारकेट है। उधर वो है, इधर ये है। तमाम बातें सुनने के बाद मैंने पूछा शम्मी कपूर प्वाइंट किधर है पता है ? शिकारे वाला निरूत्तर। उसने अचकचाते हुए बताया – वो भी इधर ही किधर आया था। शूटिंग इध्र ही होई थी 'काशमीर की कली' की भी। बोत पुरानी फिल्मों की शूटिंग इध्रे होई थी। 
  
       खैर, हम सभी शिकारे में घूम फिर कर कुछ अपने लिये शूट-शॉट कर वापस हो लिये। श्रीनगर एअरपोर्ट जाने के पहले दिल्ली ढाबा में आलू के पराठे खाये। आनंद लिये। एअरपोर्ट पहुंच कर सुखोई की कर्णभेदी उड़ान का आनंद लिये। एक लंबी दाढ़ी वाले, आँखों में सुरमा लगाये कश्मीरी गार्ड को देख उसकी भाव-भंगिमा को फेसबुक पर अपडेट किये और लद्दाख यात्रा की यादों को जेहन में लिये लौट चले।


- सतीश पंचम



सरू नदी का दृश्य

Sunday, August 5, 2012

गुछून परिणय सुशीला....... मन भतरा हो दहिजरा......

    अपनी पत्नी से ससुराल में अकेले मिलने जाने की बात गुछून परसाद ने मंगर से झटके से कह तो दी लेकिन अंदर ही अंदर कहीं कुछ ‘करक’ रहा था, घर में कैसे राय-बात की जाय, मां-पिता जी को कैसे उजागर करा जाय, ससुराल जाने पर पता नहीं पत्नी क्या कुछ कहे, दुत्कारे-फटकारे कि क्या कैसे.....। इन्हीं सब बातों को सोचते-सोचते गुछून परसाद गेहूँ के खेत की ओर बढ़ चले। थोड़ी दूर रहते ही जमीन से हरी-हरी गेहूँ की सूईयां निकली दिखीं। पिछले हफ्ते बोये गेहूँ मौसमी नमीं पाकर जल्दी ही अँकुआ गये थे ठीक गुछून के मन की ताजा सूईयों की तरह।

(बमचक -11....)

    मेड़ पर उकड़ूं बैठकर सोचते-विचारते गुछून ने मेंड़ पर उगी दूब चुटकी में दबा ‘पुट्’ की ध्वनि के साथ तोड़ लिया। उंगलियों से दूब की गाठें सहलाते-सहलाते मन की गाँठ भी सहला उठीं। याद आया कि जब मनजौकी के यहां से तिलकहरू आये थे तब उनमें सालिगराम मास्टर भी थे। लहीम-शहीम देंह वाले सालिगराम मास्टर ने तिलक के दौरान सामने बंसखट पर बैठाकर पूछा था – “पढ़ाई कहां तक किये हैं गुछून जी” ?

“जी इन्टर तक” - बहुत सकुचाते हुए गुछून ने बताया था

“आगे क्यों नहीं पढ़े” ?

“जी…..जी नहीं पढ़ पाये”

“कोई विशेष बात” ?

“जी……...”

   लेकिन गुछन के बोलने से पहले ही कक्का जी ने बात संभाल ली। “ घर-दुआर की जिम्मेवारी जो न कराये सालिगराम जी, और फिर आजकल पढ़े-लिखे का हाल तो सब लोग देख-ही रहे हैं”

    सालीगराम मास्टर ने अपने चश्मे को ठीक करते हुए एक नजर काका की ओर देखा और फिर गुछून की ओर देखकर कहा – “पढ़े-लिखे लोगों में उन लोगों का ही हाल खराब होता है जो ठीक से पढ़ाई-लिखाई नहीं करते, विद्यार्जन नहीं करते। वरना तो मेरिट जिसका अच्छा बन जाय तो वह ठाठ से सरकारी नौकरी न सही कोई ढंग का काम तो करना जान ही जाता है। अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों के मुकाबले पढ़ा लिखा होना मनुष्य को ज्यादा ‘सोभता’ है”

    अबकी गुछून के कुछ कहने से पहले ही लड़की के पिता रामधारी जी आ गये – “बात तो सही कह रहे हैं सालिगराम जी, लेकिन जब लड़का इन्टर तक पढ़ गया है तो आगे भी पढ़ ही जायगा”

   खैर, ले-देकर थोड़ी देर बाद तिलक का कार्यक्रम शुरू हुआ। गुछून की उंगली में कुश की बनी अंगुठी पहनाई गई, फूल अच्छत रखे गये…. मंत्र पढ़े गये… महिलाओं का मंगलगान शुरू हुआ और फिर धीरे से एक चमचमाती सोने की अंगूठी पहना दी गई। गुछून के अंतस् में महसूस हुआ मानों वह खुद वर पक्ष का होने के नाते मौजूदा मौके पर जबरिया ऐंठ कर ‘कुश की बनी अंगुठी’ हों और ये चमचमाती सोने की अंगुठी वधू मनजौकी...... नहीं...नहीं मनजौकी नहीं, ‘सुशीला’....विवाह के पहले तो यही नाम था मनजौकी का, वो तो घर की महिलाओं ने बिगाड़ दिया कह-कह कर कि- चाहे जितना सिखाया पढाया जाय, करती अपने मन की ही है। उसका एक बार मनजौकी नाम पड़ा तो बस पड़ ही गया। सुशीला पहले सुसीला बनी और फिर मनजौकीया.

    सोने की अंगुठी सी सुशीला, घसिहर ‘कुश’ से गुछून......उसके बाद तो टीमटाम से विवाह हुआ - विवाह में जा रही सफ़ेद अम्बेस्डर पर पीला-गुलाबी कागज चिपका था...महेन्द्रा वाली कपड़ही जीप पर भी वही कागज चिपका था जिस पर कि लिखा था ...

गुछून

     परिणय

            सुशीला



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......अम्बिका प्रिंटिंग प्रेस, अजोरहा.



लेकिन आज गुछून तो गुछून ही रहे, हां, सुशीला मनजौकी हो गईं.

  “नंदिनी बत्तीस है कि सोनालिका चउवन” ? – किसी के द्वारा अचानक पूछने से ध्यान भंग हो गया।

"राम-राम भईया आईये-आईये.... बिजैबीर जी"

"राम-राम.....मैंने पूछा कौन गेहूँ बोये हो – नंदिनी बत्तीस कि सोनालिका चउवन" ?

"अबकी तो सोनालिका ही बोये हैं, पिछली बार नंदिनी बत्तीस बोया था – घट गया था। बाद में बाजार से खरीदना पड़ा था"

"हां बत्तीसवा में दाना तो मोटा होता है लेकिन कम उपजता है"

"ओही वजह से अबकी वह नहीं बोया। वैसे बनियौटा नंदिनी के ज्यादा दाम देता है, मोटा और अच्छा दाना दिखने से दाम बढ़ जाता है"

"हां ये बात तो है, बेचना हो तो नंदिनी बोओ, लेकिन जब अपने ही घर का खेवा-खर्चा चलाना है तो सोनालिका से अच्छा और कोई गेहूँ नहीं है भले उसका दाना छोटा होता है लेकिन अंटता है ‘पलबार’ में"

"सो तो है, वइसे कौन ओर जा रहे थे" ?

"यहीं 'असोक' के यहां जा रहा था, बयाना देने. बिट्टी की बिदाई कराकर लाना है तो सोचा असोक की जीप ही कर लूँ, दूसरे और किसी से थोड़ा सस्ते में ही पड़ेगा"

"यहीं भदोही की ओर ही तो जाना होगा न जीपिया को"

"हां, वो क्या न उधरै तो है, अरे गये तो थे चौथ लेकर देखे नहीं थे क्या" ?

"गया था, बहुत दिन हो गया"

"हां तो सत-अठ साल तो हो ही गया. वैसे तुम कब ला रहे हो अपनी दुलहनिया को. कुछ बात-ओत किये ससुराल वालों से"

अचानक इस तरह पूछ लिये जाने से गुछून को कुछ यूँ लगा मानों उसके मन की बात पकड़ ली गई हो. संभलते हुए कहा – "हां, बात चलाई तो है देखो कब वो लोग बिदा करते हैं"

"अरे तो लिवा आओ भाई, काहे मनमुटाव किये हो. थोड़ा बहुत ठकठेवन तो लगा ही रहता है घर गिरहथी में ..... भले अपने मायके में है तो क्या लेकिन है तो तुम्हारा ‘पलबार’ ही.... जिदियाने काम न चलेगा, जाओ और लिवा आओ".

गुछून परसाद सिर नीचे कर बात सुनते रहे, इस बीच बिजैबीर कब उठकर चले गये पता न चला। उंगलीयों में रखी दूब बात ही बात में गुछून ने ‘कुपुट’ दी थी, दूब से गांठ तो निकल गई थी, बची रह गई थी गोल सींक.........।

    दूर कहीं लाउडस्पीकर पर कोई 'कहंरवा' गीत बजा रहा था जो कभी-कभी हवा के रूख के अनुसार तेज सुनाई पड़ने लगता तो कभी धीमा.


मन भतरा हो दहिजरा के नाती
पेड़ा मिठईया कबहूं न खियावई
अरे गाजर खियावै भर-भर खाँची
मन भतरा हो दहिजरा के नाती 

लाल पियर कबहूं नहीं पहिरा
अरे बांधी कमरिया के काटी
मन भतरा हो दहिजरा के नाती
अरे लाल पलंग कबहूं नहीं सोवा
अरे लाल पलंग कबहूं नहीं सोवामन भतरा हो.....
     अबकी गुछून मेंड़ पर से उठे तो वह उठना कुछ अलग किस्म का था. उस उठाव में कहीं एक तरह की दृढ़-निश्चयता दिख रही थी.

(जारी......)

- सतीश पंचम


नोट : पिछली बार जब गुछून और मंगर की कड़ी लिखा था तो सोचा था कि अगली कड़ी जल्द लिखूंगा लेकिन लिखते-लिखते दस दिन होने आये और गुछून परसाद बिसरा उठे। दरअसल गुछून के कैरेक्टर में घुसकर बमचक लिखने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, तब और जबकि माहौल बम्बईया हो, तमाम 'सोचहरी' आईटी-सॉफ्टवेयर आदि के इर्द-गिर्द चल रही हो... इसलिये अगली कड़ी कब आयेगी कह नहीं सकता. कोशिश करूंगा कि जल्द से जल्द लिखी जाय. वैसे भी कौन सा साहित्य का नोबल प्राईज छूटा जा रहा है :-)

( चित्र - मेरे गाँव  में किसी खेत का है ...."मन भतरा" गीत एक नौटंकी से है )

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Saturday, August 4, 2012

Shuttlecock Boys - पाठ्यक्रम में पढ़ाये जाने योग्य फिल्म

         ऐसी फिल्में गिनती की संख्या में बनी हैं जो किसी न किसी तरह से मैनेजेरियल टेक्नीक से जुड़ी हों या अपने एंटरटेन्मेंट वैल्यू को दर्शाते हुए कुछ हटकर सोचने को मजबूर करें। कुछ समय पहले रॉकेट सिंह आई थी जिसमें ऐसे ही ‘Entrepreneurship’  को लेकर कुछ हटकर सोचा गया था और अब यह शटलकॉक ब्वॉयज जिसमें ‘Entrepreneurship’ को सरल अंदाज में चार युवकों की कहानी के जरिये अपने पूरे एन्टरटेन्मेंट वैल्यू के साथ दर्शाया गया है।

    इस फिल्म के पात्रों को देखकर मन में आता है अरे, ये तो अपने मोहल्ले के गोलू जैसा लगता है, और वो...वो तो छह नंबर की बिल्डिंग वाला पंकज लगता है, और वो…उसे भी कहीं देखा है आते-जाते.... उसी की तरह चलता, उसी की तरह बोलता है। Shuttlecock Boys ऐसी ही फिल्म है जिसके पात्रों को देखते हुए ऐसा ही कुछ महसूस होता है। वहां यह नहीं लगता कि इसके कैरेक्टर कहीं आसमान से उतरे हैं, गोरे-चिट्टे हैं, या एक साथ आठ-दस को मार गिरा देने वाले हैं। वे सरल, सीधे और अपने आस-पास से लगने वाले युवकों की तरह ही हैं। उनके बोलने का ढंग, कपड़े पहनने का ढंग, उनके आपसी हंसी-ठट्ठा का ढंग सब कुछ अपने आस-पास का नॉर्मल लगता है और यही नॉर्मल्सी इस फिल्म का जबर्दस्त प्लस प्वाइंट है।

       फिल्म चार युवकों की है जिनमें से हर एक कहीं न कहीं जमाने की रेस में पिछड़ सा गया है। कोई कॉल सेन्टर में है, कोई होटल में रसोइया है, कोई सीए की तैयारी कर रहा है लेकिन दिल नहीं लग रहा, पढ़ाई के नाम पर बस पढ़ाई कर रहा है तो कोई क्रेडिट कार्ड या सेल्स का काम कर रहा है। उसके साथ वाले कहीं उपर पहुंच गये हैं, सेटल हो गये हैं, लेकिन ये है कि अब भी कहीं ऑफिस के बाहर खड़े-खड़े – मैम कैन यू गिव मी वन मिनट प्लीज, इट्ज ए स्पेशल स्कीम, इट्ज बेनिफिशियल कहकर बस जैसे तैसे नौकरी कर रहा है।

     ये चारों युवक रात में अपनी गली में कहीं दो बिल्डिंगों के बीच नेट बांधकर बैडमिन्टन खेलते हैं, कुछ आपसी बातें शेयर करते हैं, हंसी-मजाक होता है, धौल-धप्पा होती है. और जैसा कि माना गया है क्रियेटिवीटी या नई संभावनायें उथल-पुथल वाले माहौल में ही ज्यादा निकल कर बाहर आती हैं, यहां भी ऐसा ही कुछ होता है। एक रात जब एक बंदे की नौकरी छूट जाती है और दूसरा अपनी हताश कर देने वाली सेल्स नौकरी से तंग आ जाता है तो उनमें से एक को आईडिया सूझता है कि क्यों न खुद का कुछ शुरू किया जाय। ऐसे में वह दोस्त तो तैयार हो जाता है जिसकी हाल ही में नौकरी छूटी है लेकिन लेकिन बाकी के दो तैयार नहीं होते। उनकी लाइफ में अभी तक कोई सीरियस झटका आया नहीं है। हां, परेशान और हताश तो वे भी हैं अपने मौजूदा हालात से लेकिन उतने नहीं जितने कि बाकी के दो हैं।

      अब सबसे जरूरी सवाल उठता है काम कौन सा किया जाय ? कौन सा ऐसा काम हो जिसमें इन्वेस्टमेंट कम हो, फिर मार्केट कैसे एक्सप्लोर किया जाय, किसे बेचा जाय। ऐसे तमाम जरूरी सवाल उठते हैं जो फिल्म देखते वक्त एमबीए में बार-बार पढ़ाये जाने वाले टर्म ‘Entrepreneurship’ की याद दिलाते रहते हैं। इसी दौरान एक बंदा सुझाता है कि क्यों न कैटरिंग का बिजनेस किया जाय, इसमें शुरूवाती लागत भी कम है और फिर आसपास कई सारी नई सॉफ्टवेयर कंपनीयां भी खुल गई हैं, उनमें स्नैक्स, खाना आदि की जरूरत तो पड़ेगी ही। इस तरह ये बंदे अपने लेवल पर उपलब्ध रिसोर्सेस से प्रॉडक्ट सेलेक्ट करते हैं, कुछ एलर्टनेस से अपने प्रॉडक्ट के लिये मार्केट की पहचान करते हैं, एक्सप्लोर करते हैं। सवाल उठता है कि उनके एडमिन से मिला कैसे जाय, क्या कहकर बताया जाय कि हम आपको अच्छी सर्विस दे सकते हैं जबकि पहले से उनके पास वेंडर उपलब्ध हो। उन्हीं में से एक बंदा जो सेल्स में रह चुका है वह यह जिम्मा संभालता है लेकिन उसके लिये भी यह टेढ़ी खीर साबित होता है। लोग उनकी कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड मांगते हैं, पहले का एक्सपिरियंस पूछते हैं, किचन आदि की व्यवस्था पूछते हैं। लेकिन इस लेवल पर क्या बताया जाय जबकि अभी शुरूवाती स्टेज पर ही कारोबार अंकुआया हो। इन्हीं सब बातों से दो-चार होती यह फिल्म अंत तक जोड़े रहती है और मन ही मन दर्शक कब इन फिल्मी पात्रों से जुड़़ जाते हैं पता नहीं चलता। लोग बस मुग्ध हो देखते रहते हैं इन युवकों के हौसले को, उनके जज्बे को, तमाम परेशानियों से निकलने की उनकी जद्दोजहद को।

        बता दूं कि एंटरटेन्मेंट वैल्यू के लिहाज से यह फिल्म भले ही गीत-संगीत के तड़कों से ज्यादा कुछ न सजी हो लेकिन Entrepreneurship को जिस सरल अंदाज में दर्शाती है वह इसे Hollywood की फिल्म Twelve Angry Men के समकक्ष ला खड़ा करती है जो कि “Managerial Technique of Decision Making” के रूप में कई संस्थानों में पढ़ाई जाती है। चाहें तो देश के विभिन्न तकनीकी या मैनेजमेंट शिक्षा संस्थान इस फिल्म को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बना सकते हैं जिसमें बेहद सरल अंदाज में किसी व्यवसाय को शुरू करने में होने वाले what, where, who, when जैसे प्रश्नों को टैकल किया गया है।

     जहां तक फिल्म के तकनीकी का सवाल है मात्र 35 लाख में बनी यह फिल्म स्क्रीन पर थोड़ी सी डल सी दिखती है, चटख रंग नहीं है इसके बावजूद फिल्म अपने आपको कम्यूनिकेट करने में सफल रही है, धूसरपन कहीं से भी बाधा नहीं बनता। कैमरा कहीं कहीं शेकी लगा है, लाइटिंग भी कहीं-कहीं चटख सी गई है लेकिन 35 लाख में यह सब कर ले जाना बड़ी बात है। सब्जी मंडी और उसके कीचड़ को बेहद सधे अंदाज से दिखाने पर अलग ही निखार आ गया है। कुछ ह्यूमर भी दिखाया गया है तब जबकि सीए की तैयारी करते युवक का पिता वहीं सब्जी खरीदने पहुंचता है जहां उसका बेटा भी अपने कैटरिंग के बिजनेस के लिये सब्जी खरीद रहा होता है।

Hemant Gaba और उनकी टीम को इतनी शानदार फिल्म बनाने के लिये बधाई.


- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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